आदिवासी महोत्सव 2026
दिशोम गुरु श्री शिबू सोरेन
झारखंड की पहचान और उसकी जनजातीय अस्मिता की यात्रा केवल उत्सवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वर्षों के संघर्ष, धैर्य और सामूहिक संकल्प से आकार लेती है। इस ऐतिहासिक यात्रा में "दिशोम गुरु" श्री शिबू सोरेन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को अविभाजित बिहार (वर्तमान झारखंड) के रामगढ़ जिले स्थित नेमरा गांव में हुआ था।
उन्होंने जल, जंगल और ज़मीन के अधिकारों के साथ-साथ आदिवासी समाज के सम्मान और अधिकारों के लिए निरंतर आवाज़ उठाई। उनके सशक्त नेतृत्व और जनआंदोलन ने ही उस वैचारिक नींव को मजबूत किया, जिसने आगे चलकर झारखंड राज्य के निर्माण और उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को नई दिशा दी।
यह महोत्सव हमें याद दिलाता है कि संस्कृति अतीत की धरोहर होने के साथ-साथ भविष्य की आधारशिला भी है। जब कोई समाज अपनी भाषा, परंपराओं और लोककलाओं को संजोकर आगे बढ़ता है, तो उसकी पहचान और सशक्त होती है।
दिशोम गुरु की प्रेरणा और जनजातीय समाज के अतुलनीय योगदान का ही परिणाम है कि आज झारखंड की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर विशेष सम्मान मिल रहा है। यह आयोजन संघर्ष से सम्मान और पहचान से गौरव तक का उत्सव है।